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आंध्र प्रदेश में 16 वर्ष से कम आयु के बच्चों के लिए सोशल मीडिया प्रतिबंध का प्रस्ताव

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KIRTI

Jan 23, 2026 • 36 Views

आंध्र प्रदेश में 16 वर्ष से कम आयु के बच्चों के लिए सोशल मीडिया प्रतिबंध का प्रस्ताव

आंध्र प्रदेश में 16 वर्ष से कम आयु के बच्चों के लिए सोशल मीडिया प्रतिबंध का प्रस्ताव

 आज हम एक ऐसी खबर पर चर्चा कर रहे हैं जो आने वाले समय में इंटरनेट और हमारे बच्चों के भविष्य को बदल सकती है। आंध्र प्रदेश सरकार 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर प्रतिबंध लगाने के 'ऑस्ट्रेलियाई मॉडल' पर विचार कर रही है। इस प्रस्ताव का मुख्य उद्देश्य बच्चों को हानिकारक ऑनलाइन कंटेंट से बचाना है।

 

सोशल मीडिया किशोरों (teenagers) के मानसिक स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो सकता है, जिससे अवसाद (depression), चिंता (anxiety), कम आत्म-सम्मान, नींद में कमी और साइबरबुलिंग जैसी समस्याएं बढ़ रही हैं। यह तुलना की भावना को बढ़ावा देता है और अत्यधिक उपयोग से लत लग सकती है।

 

सोशल मीडिया के किशोरों पर होने वाले मुख्य नकारात्मक प्रभाव निम्नलिखित हैं:

  • मानसिक स्वास्थ्य समस्याएं: जो युवा सोशल मीडिया पर ज्यादा समय बिताते हैं, उनमें अवसाद और चिंता के लक्षण अधिक दिखते हैं। लगातार नकारात्मक कंटेंट या दूसरों के बेहतर जीवन को देखकर आत्मविश्वास में कमी आ सकती है।
  • FOMO और लत (Addiction): कुछ छूट जाने का डर (Fear of Missing Out - FOMO) किशोरों को बार-बार फोन चेक करने के लिए मजबूर करता है, जो डोपामाइन (dopamine) रिलीज के कारण लत बन जाता है।
  • साइबरबुलिंग और असुरक्षा: सोशल मीडिया पर नफरत, भेदभाव या अपमानजनक टिप्पणियों के कारण किशोरों को मानसिक उत्पीड़न का सामना करना पड़ता है।
  • शारीरिक छवि (Body Image) के मुद्दे: विशेष रूप से किशोर लड़कियों में, इंस्टाग्राम जैसे ऐप्स पर एडिट की गई तस्वीरें देखकर अपने शरीर को लेकर असुरक्षा और अवसाद बढ़ सकता है।
  • नींद और सामाजिक कौशल की कमी: देर रात तक स्क्रीन देखने से नींद कम होती है, और आमने-सामने की बातचीत कम होने से सामाजिक कौशल कमजोर हो सकते हैं।
  • शैक्षणिक और व्यवहारिक प्रभाव: लगातार रील्स देखने की "भेड़ चाल" में समय बर्बाद करने से पढ़ाई प्रभावित होती है और माता-पिता की बात न मानने पर चिड़चिड़ापन बढ़ता है। 

इन प्रभावों को कम करने के लिए, किशोरों के लिए सोशल मीडिया के उपयोग का समय सीमित करना और डिजिटल डिटॉक्स (digital detox) अपनाना बहुत महत्वपूर्ण है। 

 

जी हाँ, यह प्रस्ताव अभी अपने प्रारंभिक चर्चा और प्रारूपण (drafting) चरण में है। आंध्र प्रदेश के सूचना प्रौद्योगिकी (IT) मंत्री, नारा लोकेश ने स्विट्जरलैंड के दावोस में विश्व आर्थिक मंच (WEF) के दौरान इस विचार को साझा किया। उन्होंने 'ब्लूमबर्ग' को बताया कि राज्य एक मजबूत कानूनी अधिनियम बनाने की दिशा में काम कर रहा है क्योंकि एक निश्चित उम्र से कम के युवा यह नहीं समझ पाते कि वे ऑनलाइन क्या देख रहे हैं।

 इस प्रतिबंध के समर्थन में क्या तर्क दिए जा रहे हैं?

 स्रोतों (the sources) के अनुसार, समर्थक इसे बच्चों को मानसिक तनाव और हानिकारक सामग्री से बचाने के लिए एक सक्रिय कदम मान रहे हैं। इंस्टाग्राम, यूट्यूब, और फेसबुक जैसे प्लेटफॉर्म अपने एल्गोरिदम के कारण अक्सर ऐसी सामग्री को प्राथमिकता देते हैं जो हिंसक या अश्लील हो सकती है। चूंकि बच्चे बहुत संवेदनशील होते हैं, इसलिए यह उनके आत्म-बोध (self-perception) और बॉडी इमेज को गंभीर रूप से प्रभावित करता है।

लेकिन क्या इसे लागू करना तकनीकी रूप से संभव है?

 यही सबसे बड़ी चुनौती है। वर्तमान में उम्र के सत्यापन (age verification) को लेकर तकनीकी सीमाएं हैं। सवाल यह भी है कि क्या सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म राज्य स्तर के नियमों के कार्यान्वयन में सहयोग करेंगे। हालांकि ऑस्ट्रेलिया ने पहले ही ऐसा राष्ट्रव्यापी प्रतिबंध लागू किया है जहाँ टेक कंपनियों को उम्र की पुष्टि न करने पर दंड भुगतना पड़ता है, लेकिन भारत की केंद्र सरकार ने अभी तक इस तरह के व्यापक प्रतिबंधों पर कोई राय नहीं दी है।

आंध्र प्रदेश सरकार का यह कदम भविष्य में डिजिटल सुरक्षा की दिशा में एक बड़ी मिसाल बन सकता है।

 

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