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गोल्ड और सिल्वर ईटीएफ (ETF) में भारी गिरावट का सच

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SAURABH TRIPATHI

Jan 23, 2026 • 31 Views

गोल्ड और सिल्वर ईटीएफ (ETF) में भारी गिरावट का सच

 गोल्ड और सिल्वर ईटीएफ (ETF) में भारी गिरावट का सच

 पिछले कुछ दिनों से वित्तीय बाज़ारों में सिल्वर और गोल्ड के ईटीएफ (ETF) में आए बड़े क्रैश को लेकर काफी चर्चा हो रही है। जहाँ सिल्वर ईटीएफ में 20% से 24% तक की भारी गिरावट देखी गई है, वहीं गोल्ड ईटीएफ में भी लगभग 8% से 10% की कमी आई है। लेकिन हैरान करने वाली बात यह है कि असली कमोडिटी (भौतिक सोना और चाँदी) में उतनी बड़ी गिरावट नहीं आई है। आज हम समझेंगे कि आखिर यह अंतर (divergence) क्यों है।

ईटीएफ और असली सिल्वर में अंतर : 

सबसे पहले यह समझना ज़रूरी है कि ईटीएफ (Exchange Traded Fund) क्या होता है। ईटीएफ बाजार में ट्रेड होने वाला एक वित्तीय साधन (financial instrument) है, जो बिल्कुल किसी कंपनी के शेयर की तरह ट्रेड होता है। हालाँकि इसकी कीमत इसके अंडरलाइंग एसेट (जैसे सिल्वर) पर निर्भर करती है, लेकिन यह ज़रूरी नहीं कि दोनों की कीमतें हमेशा एक ही अनुपात में बदलें। ईटीएफ की कीमतें लिक्विडिटी, सेंटीमेंट, फंड फ्लो और सट्टेबाजी (speculations) जैसे कारकों से भी प्रभावित होती हैं।

गिरावट का मुख्य कारण: नेट एसेट वैल्यू और प्रीमियम :

 इस क्रैश का सबसे बड़ा कारण नेट एसेट वैल्यू (NAV) और प्रीमियम का गणित है।

  • NAV का मतलब: ईटीएफ के पास मौजूद सिल्वर की मार्केट वैल्यू को कुल यूनिट्स से विभाजित करना।
  • क्या हुआ था? हाल ही में रिटेल निवेशकों की भारी डिमांड के कारण ईटीएफ अपनी असल वैल्यू (NAV) से बहुत ज्यादा प्रीमियम पर बिक रहे थे। उदाहरण के लिए, यदि एक यूनिट की असल कीमत ₹20 होनी चाहिए थी, तो वह बाजार में ₹25 या ₹30 पर ट्रेड कर रही थी।

सट्टेबाजी और बजट का प्रभाव :

 यूनियन बजट से पहले यह अटकलें (speculations) लगाई जा रही थीं कि सरकार कस्टम ड्यूटी बढ़ा सकती है, जिससे घरेलू बाजार में चाँदी की कीमतें और बढ़ेंगी। इस उम्मीद में रिटेल निवेशकों ने ईटीएफ में भारी निवेश किया, जिससे कीमतें कृत्रिम रूप से बढ़ गईं। ईटीएफ निवेश का सबसे आसान तरीका है, इसलिए आम निवेशक भावनाओं में बहकर (emotionally driven) इसमें पैसा लगाने लगे।

ग्लोबल ट्रिगर्स और प्रॉफिट बुकिंग :

 ईटीएफ के गिरने के पीछे कुछ वैश्विक कारण भी रहे हैं:

  1. सेफ हेवन डिमांड में कमी: भू-राजनीतिक तनाव (जैसे ईरान युद्ध की आशंका) में थोड़ी नरमी आने से सुरक्षित निवेश के रूप में सोने-चाँदी की मांग कम हुई है।
  2. प्रॉफिट बुकिंग: कीमतों में आई तेज़ बढ़त के बाद सट्टेबाजों ने अपना मुनाफा वसूली (profit booking) शुरू कर दी।
  3. मजबूत अमेरिकी डॉलर: डॉलर के मजबूत होने से कीमती धातुओं की मांग पर दबाव पड़ा।
  4. रिस्क-ऑन सेंटीमेंट: निवेशक अब डर से हटकर रिस्की एसेट्स जैसे इक्विटी की ओर बढ़ रहे हैं।

एमसीएक्स (MCX) बनाम ईटीएफ :

जहाँ सिल्वर ईटीएफ 20-24% गिरे, वहीं MCX सिल्वर फ्यूचर्स में केवल 4% की गिरावट आई। इसका कारण यह है कि MCX पर ट्रेडिंग ग्लोबल प्राइसेस, ब्याज दरों और फिजिकल डिमांड-सप्लाई पर आधारित होती है, वहां रिटेल निवेशकों की वैसी 'भीड़' (frenzy) नहीं होती जैसी ईटीएफ में देखी गई।

(निष्कर्ष: क्या यह सिल्वर का अंत है? :

नहीं, यह गिरावट तकनीकी और सेंटीमेंट आधारित (technical and sentiment-driven) थी, न कि स्ट्रक्चरल। चाँदी के बुनियादी आधार (fundamentals) अभी भी मजबूत हैं, क्योंकि सोलर पैनल्स, इलेक्ट्रिक व्हीकल्स (EVs) और इलेक्ट्रॉनिक्स में इसकी औद्योगिक मांग लगातार बढ़ रही है। इसके अलावा, ग्लोबल स्तर पर सिल्वर और गोल्ड की माइनिंग (खनन) अभी भी सीमित है।

इसलिए, यह समझना ज़रूरी है कि यह क्रैश मुख्य रूप से ईटीएफ के ओवरप्राइस होने के कारण हुआ था, न कि असली सोने या चाँदी की वैल्यू खत्म होने के कारण।

 

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