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वैश्विक स्वर्ण दौड़: भारत और चीन क्यों बेच रहे हैं अमेरिकी ट्रेजरी?

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SAURABH TRIPATHI

Jan 23, 2026 • 48 Views

वैश्विक स्वर्ण दौड़: भारत और चीन क्यों बेच रहे हैं अमेरिकी ट्रेजरी?

 वैश्विक स्वर्ण दौड़: भारत और चीन क्यों बेच रहे हैं अमेरिकी ट्रेजरी?

 आज हम एक ऐसी घटना के बारे में बात करेंगे जो वैश्विक अर्थव्यवस्था की दिशा बदल रही है। दुनिया धीरे-धीरे लेकिन निश्चित रूप से डीडोलराइजेशन (De-dollarization) की ओर बढ़ रही है। हालिया खबरों के अनुसार, एक तरफ जहां 'ग्लोबल गोल्ड रश' (सोने की वैश्विक दौड़) चल रही है, वहीं दूसरी तरफ भारत और चीन अपनी अमेरिकी ट्रेजरी होल्डिंग्स को तेज़ी से कम (डंप) कर रहे हैं

अमेरिकी ट्रेजरी क्या है?: 

सबसे पहले यह समझना ज़रूरी है कि अमेरिकी ट्रेजरी क्या है। यह अमेरिका की सरकार द्वारा जारी किया गया एक ऋण साधन (debt instrument) है, जिसे दुनिया का सबसे सुरक्षित एसेट माना जाता है क्योंकि अमेरिकी सरकार के डिफ़ॉल्ट होने की संभावना न के बराबर होती है। केंद्रीय बैंक अपनी विदेशी मुद्रा भंडार (Forex Reserves) को सुरक्षित रखने और ब्याज कमाने के लिए इसमें निवेश करते हैं।

 भारत और चीन का बड़ा कदम :

 आंकड़ों की बात करें तो भारत ने एक साल में अपनी अमेरिकी ट्रेजरी होल्डिंग्स को $240 बिलियन से घटाकर $190 बिलियन कर दिया है। वहीं, चीन अपनी होल्डिंग्स को 2008 के बाद के सबसे निचले स्तर पर ले आया है। यह कोई घबराहट में की गई बिक्री (panic selling) नहीं है, बल्कि एक सोची-समझी रणनीतिक योजना का हिस्सा है।

 सोने (Gold) की ओर झुकाव क्यों? :

 इन देशों ने ट्रेजरी बेचकर उस पैसे का इस्तेमाल सोना खरीदने में किया है। भारत के विदेशी मुद्रा भंडार में सोने की हिस्सेदारी 9% से बढ़कर अब लगभग 14% हो गई है। इसके पीछे कई मुख्य कारण हैं:

  • राजनीतिक जोखिम: रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान रूस के डॉलर एसेट्स को फ्रीज़ कर दिया गया था, जिससे अन्य देशों को डर है कि अमेरिका कभी भी उन पर प्रतिबंध (sanctions) लगा सकता है।
  • सुरक्षा: 
  • सोना एक राजनीतिक रूप से तटस्थ (politically neutral) एसेट है जिसे कोई फ्रीज़ नहीं कर सकता।
  • आर्थिक अनिश्चितता: 
  • वैश्विक अस्थिरता के समय में सोना एक 'सेफ हेवन' (safe haven) माना जाता है।

 वैश्विक रुझान और भविष्य :

 यह केवल भारत और चीन तक सीमित नहीं है। दशकों में पहली बार, दुनिया भर के केंद्रीय बैंकों के पास अमेरिकी ट्रेजरी के मुकाबले सोने की वैल्यू अधिक हो गई है। इसके साथ ही, BRICS देश अपनी डिजिटल मुद्राओं को जोड़ने का प्रस्ताव दे रहे हैं ताकि व्यापार में डॉलर पर निर्भरता कम की जा सके।

डॉलर क्या है?
डॉलर अमेरिका की आधिकारिक मुद्रा है, जिसे US Dollar (USD) कहा जाता है। यह दुनिया की सबसे ताकतवर और सबसे ज़्यादा इस्तेमाल होने वाली मुद्रा मानी जाती है।

डॉलर का इतिहास

डॉलर की शुरुआत 1792 में अमेरिका में हुई

“Dollar” शब्द जर्मन शब्द Thaler से आया है

इसे अमेरिकी सरकार और Federal Reserve नियंत्रित करती है

डॉलर क्यों है इतना मजबूत?

अमेरिका की मजबूत अर्थव्यवस्था

अंतरराष्ट्रीय व्यापार में डॉलर का बड़ा इस्तेमाल

तेल और सोने की खरीद-बिक्री ज़्यादातर डॉलर में

दुनिया के केंद्रीय बैंक डॉलर को रिज़र्व करेंसी के रूप में रखते हैं

डॉलर और भारत (INR)

भारत का आयात (तेल, गैस, टेक्नोलॉजी) डॉलर में होता है

डॉलर महंगा होने पर भारत में महंगाई बढ़ती है

डॉलर सस्ता होने पर रुपया मजबूत माना जाता है

 निष्कर्ष :

 इसका मतलब यह नहीं है कि डॉलर पूरी तरह खत्म हो रहा है, लेकिन देश अब अपने पोर्टफोलियो को रीबैलेंस कर रहे हैं ताकि वे किसी भी भू-राजनीतिक झटके या अमेरिकी प्रतिबंधों से सुरक्षित रह सकें।

 

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