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UGC ने उच्च शिक्षण संस्थानों में जाति आधारित भेदभाव को खत्म करने के लिए नियम

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SAURABH TRIPATHI

Jan 24, 2026 • 28 Views

UGC ने उच्च शिक्षण संस्थानों में जाति आधारित भेदभाव को खत्म करने के लिए नियम

विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) ने उच्च शिक्षण संस्थानों में जाति आधारित भेदभाव को खत्म करने के लिए "यूजीसी उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता का प्रोत्साहन विनियम 2026" (UGC Promotion of Equity in Higher Education Institutions Regulations 2026) पेश किया है। ये नए नियम 2012 के पुराने ढांचे की जगह लेंगे, जो केवल सलाहकार (advisory) प्रकृति के थे, जबकि 2026 के नियम अनिवार्य और कानूनी रूप से बाध्यकारी हैं।

स्रोतों के आधार पर इन नए नियमों का विस्तृत विवरण नीचे दिया गया है:

1. नए नियमों की आवश्यकता और तर्क

कठोर कानूनी ढांचे की ओर यह बदलाव पिछले कुछ वर्षों में बढ़ते भेदभाव के मामलों और न्यायिक दबाव के कारण हुआ है:

  • शिकायतों में वृद्धि: यूजीसी के आंकड़ों के अनुसार, पिछले पांच वर्षों में जाति-आधारित भेदभाव की शिकायतों में 118% की वृद्धि हुई है। 2019-20 में जहाँ 173 शिकायतें थीं, वहीं 2023-24 में यह बढ़कर 378 हो गईं। कुल मिलाकर, देश भर के 74 विश्वविद्यालयों और 11,553 कॉलेजों से 15,160 शिकायतें प्राप्त हुई हैं।
  • भेदभाव के रूप: एससी (SC), एसटी (ST) और ओबीसी (OBC) समुदायों के छात्रों को सामाजिक अलगाव, पक्षपाती ग्रेडिंग, हॉस्टल में भेदभाव और शोध के अवसरों से वंचित किए जाने जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ता था,।
  • न्यायिक हस्तक्षेप: सुप्रीम कोर्ट ने छात्र आत्महत्याओं और कमजोर शिकायत निवारण प्रणाली को लेकर यूजीसी की आलोचना की थी और अधिक सख्त नियम लागू करने का निर्देश दिया था।

2. प्रमुख संरचनात्मक सुधार

2026 के नियम केवल शिकायतों पर प्रतिक्रिया देने के बजाय संस्थानों में सुधार लाने पर केंद्रित हैं:

  • समान अवसर केंद्र (EOC): प्रत्येक संस्थान को एक EOC (Equal Opportunity Centre) स्थापित करना होगा, जो छात्रों को शैक्षणिक, सामाजिक और मनोवैज्ञानिक सहायता प्रदान करेगा। छोटे कॉलेज अपनी संबद्ध यूनिवर्सिटी के साथ इसके लिए समझौता कर सकते हैं।
  • विविधतापूर्ण समितियां: शिकायतों की जांच करने वाली मुख्य समिति में SC, ST, OBC, महिलाओं और विकलांग व्यक्तियों का प्रतिनिधित्व अनिवार्य किया गया है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि निर्णय केवल प्रशासनिक संभ्रांत वर्ग (administrative elites) द्वारा ही न लिए जाएं।
  • 24/7 इक्विटी हेल्पलाइन: संकट में फंसे छात्रों को तत्काल सहायता और मार्गदर्शन प्रदान करने के लिए एक गोपनीय हेल्पलाइन शुरू की जाएगी।
  • समयबद्ध अपील: यदि कोई छात्र समाधान से संतुष्ट नहीं है, तो वह 30 दिनों के भीतर लोकपाल (Ombudsman) के पास अपील कर सकता है, जिसे एक निश्चित समय सीमा में निर्णय लेना होगा।

3. दायरा और परिभाषा

नए नियमों में भेदभाव की परिभाषा को अधिक स्पष्ट और व्यापक बनाया गया है:

  • OBC का समावेश: 2012 के नियमों के विपरीत, 2026 के नियमों में OBC समुदाय को स्पष्ट रूप से शामिल किया गया है।
  • व्यापक कवरेज: ये नियम सभी केंद्रीय, राज्य, निजी, डीम्ड विश्वविद्यालयों और अल्पसंख्यक संस्थानों पर लागू होंगे,।
  • सभी के लिए लागू: इसमें स्नातक से लेकर पीएचडी तक के छात्र, शिक्षण और गैर-शिक्षण कर्मचारी, वार्डन और यहाँ तक कि संविदात्मक (contractual) या अस्थायी कर्मचारी भी शामिल हैं।
  • भेदभाव की पहचान: इसमें अलग तरह का व्यवहार (differential treatment), सामाजिक बहिष्कार, अपमान और अकादमिक पक्षपात जैसी स्थितियों को भेदभाव माना गया है,।

4. जवाबदेही और दंड

2026 के नियमों की सबसे बड़ी विशेषता जवाबदेही तय करना है:

  • व्यक्तिगत जिम्मेदारी: संस्थान के प्रमुख (कुलपति या प्राचार्य) अब इन नियमों के पालन और समय-समय पर रिपोर्ट जमा करने के लिए व्यक्तिगत रूप से जिम्मेदार होंगे।
  • सख्त दंड: नियमों का पालन न करने वाले संस्थानों पर यूजीसी फंड रोकना, नए पाठ्यक्रम शुरू करने पर रोक लगाना, दूरस्थ शिक्षा कार्यक्रमों को निलंबित करना या संस्थान की मान्यता रद्द (derecognition) करने जैसी कड़ी कार्रवाई कर सकता है,।
  • निगरानी: यूजीसी देश भर में औचक निरीक्षण और ऑडिट करेगा ताकि इन नियमों के कार्यान्वयन पर नजर रखी जा सके।

5. चल रही बहस

जहाँ समर्थक इन नियमों को संस्थागत भेदभाव के खिलाफ एक बड़ा और जरूरी कदम मान रहे हैं, वहीं कुछ आलोचकों का तर्क है कि इससे अत्यधिक नौकरशाही (over-bureaucratisation) बढ़ सकती है,। कुछ का यह भी मानना है कि सामान्य वर्ग के खिलाफ झूठी शिकायतें दर्ज करने के लिए इन नियमों का दुरुपयोग हो सकता है, जिससे संस्थानों पर प्रशासनिक बोझ बढ़ेगा। अंततः, इन नियमों की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि इनका क्रियान्वयन कितना निष्पक्ष और सटीक रहता है।

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