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BSE बनाम NSE बनाम MSE: क्या टूटेगी दलाल स्ट्रीट की डओपोली?

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SAURABH TRIPATHI

Jan 18, 2026 • 32 Views

BSE बनाम NSE बनाम MSE: क्या टूटेगी दलाल स्ट्रीट की डओपोली?

 क्या आपने कभी गौर किया है कि दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्था में आपकी दौलत के दरवाज़े महज़ दो चाबियों—BSE और NSE—से खुलते हैं? दशकों से इन दोनों ने दलाल स्ट्रीट पर एक 'साइलेंट डओपोली' (Silent Duopoly) बना रखी है। लेकिन अब एक तीसरा खिलाड़ी, मेट्रोपॉलिटन स्टॉक एक्सचेंज (MSE), इस मैदान में उतर रहा है। आज हम डिकोड करेंगे कि क्या MSE वाकई इन दिग्गजों को टक्कर दे पाएगा या यह महज़ एक और नाकाम कोशिश बनकर रह जाएगा।

BSE और NSE का दबदबा :

भारत में BSE (बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज) विरासत का प्रतीक है; यह 1875 में स्थापित एशिया का सबसे पुराना एक्सचेंज है और इसका 'सेंसेक्स' पूरी दुनिया में बेंचमार्क माना जाता है। वहीं दूसरी ओर, NSE (नेशनल स्टॉक एक्सचेंज) तकनीक का बादशाह है, जिसने इलेक्ट्रॉनिक ट्रेडिंग की शुरुआत की और आज इक्विटी डेरिवेटिव्स में 99% हिस्सेदारी के साथ दुनिया का सबसे बड़ा प्लेटफॉर्म है।

बाज़ार की वर्तमान स्थिति: साइलेंट डओपोली

भारतीय शेयर बाज़ार वर्तमान में BSE (बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज) और NSE (नेशनल स्टॉक एक्सचेंज) की एक 'साइलेंट डओपोली' के अधीन है।

BSE: यह 1875 में स्थापित एशिया का सबसे पुराना एक्सचेंज है और इसका 'सेंसेक्स' पूरी दुनिया में बेंचमार्क माना जाता है।

NSE: यह तकनीकी रूप से अत्यधिक उन्नत है और इक्विटी डेरिवेटिव्स में 99% हिस्सेदारी के साथ दुनिया का सबसे बड़ा प्लेटफॉर्म है ।

MSE (पुराना नाम MCX-SX) ने 2008 से 2015 के बीच रेगुलेटरी विवादों और पेमेंट क्राइसिस का सामना किया है। अब वे अपनी बैलेंस शीट साफ करके और नई तकनीक के साथ वापसी की कोशिश कर रहे हैं। सफल होने के लिए उन्हें कुछ विशेष करना होगा:

कम ट्रांजैक्शन चार्ज: ट्रेडर्स को आकर्षित करने के लिए लागत कम करनी होगी。

नीश मार्केट (Niche Market): कार्बन क्रेडिट्स या स्मॉल-कैप फोकस्ड इंडेक्स जैसे अनछुए क्षेत्रों पर ध्यान देना होगा。

बड़े निवेशकों का भरोसा: Groww जैसे प्लेटफॉर्म का निवेश इनके लिए एक सकारात्मक संकेत है।

तीसरे खिलाड़ी के लिए चुनौतियाँ :

अर्थशास्त्रियों के अनुसार, नए स्टॉक एक्सचेंज का फेल होना महज़ 'बैड लक' नहीं, बल्कि एक गणितीय निश्चितता (Mathematical Certainty) है। इसके तीन मुख्य कारण हैं:

  1. नेटवर्क इफेक्ट और लिक्विडिटी: 
  2. स्टॉक एक्सचेंज एक सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म की तरह होता है। जैसे आप उस Facebook पर नहीं जाएंगे जहाँ आपके दोस्त न हों, वैसे ही ट्रेडर्स वहीं जाते हैं जहाँ खरीदार और विक्रेता (लिक्विडिटी) पहले से मौजूद हों।
  3. स्विचिंग की अदृश्य लागत: एक ब्रोकर के लिए नए एक्सचेंज से जुड़ना महज़ सॉफ्टवेयर अपडेट नहीं है। इसके लिए करोड़ों का IT इंफ्रास्ट्रक्चर, रिस्क मैनेजमेंट और कंप्लायंस की नई परतें तैयार करनी पड़ती हैं।
  4. फ्रेगमेंटेड लिक्विडिटी रिस्क: सेबी (SEBI) को डर रहता है कि अगर बाज़ार कई हिस्सों में बँट गया, तो प्राइस डिस्कवरी (कीमत का सही निर्धारण) कमजोर हो जाएगी और आर्बिट्रेज की समस्या बढ़ेगी।

MSE का सफर और मास्टरप्लान :

MSE (पुराना नाम MCX-SX) ने 2008 से 2015 के बीच काफी उतार-चढ़ाव देखे हैं, जिसमें रेगुलेटरी विवाद और पेमेंट क्राइसिस शामिल थे। लेकिन अब, उन्होंने अपनी बैलेंस शीट साफ की है और नई तकनीक के साथ वापसी कर रहे हैं। Groww जैसे बड़े खिलाड़ी ने इसमें निवेश किया है, जो एक सकारात्मक संकेत है।

सफल होने के लिए MSE को कुछ 'एक्स-फैक्टर' दिखाने होंगे:

  • क्रांतिकारी तकनीक जो BSE/NSE से बेहतर हो।
  • कम ट्रांजैक्शन चार्ज ताकि ट्रेडर्स आकर्षित हों।
  • अनछुए सेगमेंट्स (Niche Markets) पर फोकस, जैसे कि कार्बन क्रेडिट्स या स्मॉल-कैप इंडेक्स।

तीसरे एक्सचेंज की ज़रूरत क्यों है? :

अगर MSE कामयाब होता है, तो इसके कई फायदे होंगे:

  • प्राइसिंग में प्रतिस्पर्धा: ट्रांजैक्शन चार्ज कम हो सकते हैं।
  • सिस्टमैटिक सेफ्टी: यदि कभी NSE का सर्वर डाउन होता है, तो एक तीसरा मजबूत एक्सचेंज बैकअप के तौर पर काम कर सकता है।
  • प्रोडक्ट इनोवेशन: नए वित्तीय उत्पाद बाज़ार में आ सकते हैं।

निष्कर्ष :

पूरी दुनिया में, चाहे अमेरिका हो (NYSE और Nasdaq) या चीन (Shanghai और Shenzhen), आमतौर पर दो ही बड़े एक्सचेंजों का दबदबा रहता है। MSE के लिए यह चुनौती किसी पत्थर को पहाड़ पर चढ़ाने (Sisyphus task) जैसी है। यदि वे सफल होते हैं, तो यह भारत के वित्तीय इतिहास का सबसे बड़ा बदलाव होगा।

 

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