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बोर्डरूम से ज़मीनी स्तर तक – एक डिलीवरी पार्टनर का दिन

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SAURABH TRIPATHI

Jan 13, 2026 • 2 Views

बोर्डरूम से ज़मीनी स्तर तक – एक डिलीवरी पार्टनर का दिन

राघव चड्ढा: राज्यसभा सांसद और आप (AAP) नेता।

  1. डिलीवरी राइडर: एक असली ब्लिंकिट पार्टनर।
  2. ग्राहक: सामान मंगवाने वाला व्यक्ति।

 तैयारी (Location: एक ब्लिंकिट स्टोर के पास :

(दृश्य की शुरुआत राघव चड्ढा से होती है जो अपनी औपचारिक पोशाक बदलकर ब्लिंकिट की टी-शर्ट और जैकेट पहन रहे हैं।)

राघव चड्ढा (कैमरे की ओर देखते हुए): "अक्सर नीतियां बोर्डरूम में बनती हैं, लेकिन आज मैं यहाँ ग्रासरूट्स (जमीनी स्तर) पर यह अनुभव करने आया हूँ कि एक गिग वर्कर का जीवन असल में कैसा होता है।"

 सामान उठाना और यात्रा (Location: स्टोर और सड़क :

राघव चड्ढा एक राइडर से डिलीवरी बैग लेते हैं। वे एक स्कूटर पर पीछे (pillion) बैठकर स्टोर पर जाते हैं और डिलीवरी के लिए सामान इकट्ठा करते हैं।

राघव चड्ढा (सफर के दौरान): "ये प्लेटफॉर्म सिर्फ एल्गोरिदम की वजह से सफल नहीं हैं। ये इंसानी पसीने और मेहनत की वजह से चल रहे हैं। हमें राइडर्स को केवल 'डिस्पोजेबल डेटा पॉइंट्स' नहीं, बल्कि इंसान समझना होगा।"

 डिलीवरी और चुनौतियाँ (Location: ग्राहक का घर:

राघव चड्ढा (गंभीर स्वर में): "10 मिनट की डिलीवरी का कल्चर राइडर्स पर अत्यधिक दबाव डालता है। अपनी जान जोखिम में डालकर, तेज रफ्तार में गाड़ी चलाकर वे इन डेडलाइन्स को पूरा करते हैं। मैंने संसद में भी 10-minute delivery सेवाओं पर प्रतिबंध लगाने की मांग उठाई है।"

 समापन संदेश (Location: सड़क के किनारे :

 

राघव चड्ढा: "कम वेतन, लंबे काम के घंटे और सामाजिक सुरक्षा (social security) की कमी – यह गिग इकोनॉमी शोषण की अर्थव्यवस्था नहीं बननी चाहिए। भारत के बढ़ते हुए कार्यबल के लिए हमें बेहतर सुरक्षा सुनिश्चित करनी होगी।"

एक सरल सादृश्य (Analogy): 

जिस तरह एक घड़ी की सुइयाँ तभी सही समय दिखाती हैं जब उसके अंदर के छोटे पुर्जे बिना घिसे काम करें, उसी तरह हमारी डिजिटल अर्थव्यवस्था के ये गिग वर्कर वे पुर्जे हैं जिन्हें यदि अत्यधिक दबाव (जैसे 10 मिनट की डिलीवरी) में रखा गया, तो पूरी मशीनरी ही प्रभावित होगी।

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