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दक्षिण भारतीय सिनेमा के 'थलापति' विजय अपनी आखिरी फिल्म 'जन नायकन' के साथ पर्दे पर विदा लेने के लिए तैयार हैं

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KIRTI

Jan 05, 2026 25
दक्षिण भारतीय सिनेमा के 'थलापति' विजय अपनी आखिरी फिल्म 'जन नायकन' के साथ पर्दे पर विदा लेने के लिए तैयार हैं

 'जन नायकन' का जादू और थलापति का विदाई संदेश

 दक्षिण भारतीय सिनेमा के 'थलापति' विजय अपनी आखिरी फिल्म 'जन नायकन' के साथ पर्दे पर विदा लेने के लिए तैयार हैं, और उनके फैंस के बीच इसे लेकर ऐसी दीवानगी है जो पहले कभी नहीं देखी गई।, पोंगल के अवसर पर 9 जनवरी को रिलीज होने वाली इस फिल्म के लिए कर्नाटक में एडवांस बुकिंग शुरू हो चुकी है।

एडवांस बुकिंग का धमाका 

बेंगलुरु के मुकुंदा थिएटर जैसे सिनेमाघरों में सुबह 6:30 बजे के स्पेशल शो के टिकट 1800 से 2000 रुपये तक में बिक रहे हैं। आलम यह है कि 'BookMyShow' पर कर्नाटक के अधिकांश शो पहले ही हाउसफुल हो चुके हैं। हालाँकि, तमिलनाडु के फैंस को अभी थोड़ा इंतज़ार करना होगा, क्योंकि फिल्म अभी सेंसर बोर्ड (CBFC) से सर्टिफिकेट मिलने का इंतज़ार कर रही है।

 33 साल का सुनहरा सफर

 विजय थलापति का फिल्मी सफर मात्र 10 साल की उम्र में एक बाल कलाकार के रूप में शुरू हुआ था। 18 साल की उम्र में फिल्म 'नालैया थीरपू' (1992) से बतौर हीरो डेब्यू करने वाले विजय ने अपने 33 साल लंबे करियर में 'मास्टर' और 'थेरी' जैसी 68 ब्लॉकबस्टर फिल्में दी हैं।, 'जन नायकन' उनके करियर की 69वीं और आखिरी फिल्म होगी।

 सिनेमा से सियासत तक 

51 साल की उम्र में एक्टिंग छोड़ने का फैसला विजय ने अपनी राजनीतिक पारी के लिए लिया है। उन्होंने इसी साल 2 फरवरी को अपनी पार्टी ‘तमिलगा वेत्री कषगम’ लॉन्च की थी और अब उनका पूरा लक्ष्य 2026 के तमिलनाडु विधानसभा चुनाव पर है।

 फैंस के लिए भावुक संदेश 

मलेशिया में फिल्म के ऑडियो लॉन्च के दौरान विजय ने भावुक होते हुए कहा था— "लोग मेरे लिए थिएटर आते हैं और लाइन में खड़े होते हैं। इसलिए अब मैं अगले 30–33 साल उनके लिए खड़ा रहना चाहता हूँ।"

भले ही विजय अब बड़े पर्दे पर नज़र नहीं आएंगे, लेकिन 'जन नायकन' के साथ वह अपने फैंस को एक यादगार विदाई देने जा रहे हैं।,

अतिरिक्त जानकारी :

 यह जानकारी स्रोतों पर आधारित है, लेकिन वर्तमान वास्तविक स्थितियों और फिल्म की रिलीज से जुड़ी अन्य अपडेट्स के लिए स्वतंत्र रूप से पुष्टि करना उचित होगा।

एक सरल तुलना: 

विजय थलापति का सिनेमा से राजनीति में जाना वैसा ही है जैसे एक खिलाड़ी अपने करियर के शिखर पर कप्तानी छोड़कर देश की सेवा के लिए एक नई जिम्मेदारी संभाल ले; जहाँ तालियों की गूँज अब चुनावी रैलियों में बदलने वाली है।

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